विशेष सवाददाता एन 20 न्यूज
मेरठ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम स्थान रखने वाले मेरठ जिले में समाजवादी पार्टी के संगठन को लेकर अब पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच ही सवाल उठने लगे हैं। देहात से लेकर महानगर तक संगठन की सक्रियता कमजोर होने की चर्चा सपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच तेज हो गई है। वहीं, आजाद समाज पार्टी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी लगातार विभिन्न मुद्दों को लेकर सड़क पर सक्रिय नजर आ रही हैं।पिछले कुछ समय में विपक्षी दलों के नेताओं का मेरठ में दौरा और धरना-प्रदर्शन भी चर्चा का विषय बना हुआ है। आजाद समाज पार्टी और कांग्रेस के नेताओं के अलावा आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह भी विभिन्न मुद्दों को लेकर मेरठ में धरना-प्रदर्शन और राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल होते रहे हैं। इसके मुकाबले समाजवादी पार्टी की स्थानीय सक्रियता को लेकर कार्यकर्ताओं में असंतोष दिखाई दे रहा है।
पहले हर मुद्दे पर सड़क पर उतरती थी सपा
सपा के कुछ स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि पूर्व में प्रदेश सरकार के खिलाफ किसी बड़े मुद्दे को लेकर जिला स्तर पर तत्काल धरना-प्रदर्शन और आंदोलन किया जाता था। पार्टी पदाधिकारी और कार्यकर्ता सड़कों पर दिखाई देते थे, लेकिन अब ऐसी सक्रियता पहले की तुलना में कम नजर आती है।कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सरकार या प्रशासन से जुड़े किसी मुद्दे पर पार्टी की स्थानीय इकाई की ओर से बड़े आंदोलन की बजाय कई बार कार्यालय तक ही गतिविधियां सीमित रह जाती हैं। उनका कहना है कि इससे कार्यकर्ताओं का उत्साह प्रभावित हो रहा है और जनता के बीच भी पार्टी की सक्रियता कमजोर दिखाई देती है।
क्या अखिलेश यादव को मेरठ संगठन पर देना होगा ज्यादा ध्यान?
मेरठ में सपा संगठन की स्थिति को लेकर अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को जिले के संगठन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। कार्यकर्ताओं का एक वर्ग मानता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी को मजबूत करने के लिए बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करना और स्थानीय मुद्दों पर लगातार आंदोलन करना जरूरी है।राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यदि विपक्षी दल किसी मुद्दे को लेकर लगातार जनता के बीच सक्रिय रहते हैं और सपा जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टी उस मुद्दे पर अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है, तो उसका राजनीतिक लाभ सत्तारूढ़ भाजपा को मिल सकता है।
बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने की चुनौती
मेरठ में सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने की है। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा है कि महानगर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक नियमित जनसंपर्क, आंदोलन और स्थानीय समस्याओं को उठाने की जरूरत है।हालांकि, सपा के स्थानीय नेताओं का पक्ष है कि पार्टी संगठन अपने स्तर पर लगातार काम कर रहा है और आने वाले समय में संगठनात्मक गतिविधियों को और तेज किया जाएगा।अब देखने वाली बात होगी कि मेरठ में सपा अपने संगठन को दोबारा कितना सक्रिय कर पाती है और विपक्षी दलों की बढ़ती सक्रियता के बीच अपनी राजनीतिक जमीन को किस तरह मजबूत करती है।
संगठन पर ध्यान नहीं दिया तो बिगड़ सकता है सियासी समीकरण
2027 विधानसभा चुनाव से पहले मेरठ में समाजवादी पार्टी के संगठन की कमजोरी पार्टी के लिए चिंता का विषय बन सकती है। यदि समय रहते बूथ स्तर से लेकर महानगर और देहात तक संगठन को सक्रिय नहीं किया गया और कार्यकर्ताओं में दोबारा जोश नहीं भरा गया, तो इसका सीधा असर आगामी चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन पर पड़ सकता है।स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा है कि जिस तरह कांग्रेस, आजाद समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी अलग-अलग मुद्दों को लेकर जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं, उससे सपा के सामने अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखने की चुनौती बढ़ सकती है।कार्यकर्ताओं का मानना है कि 2027 से पहले अगर पार्टी नेतृत्व ने मेरठ संगठन की कमजोरी पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया, तो सपा को इसका राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करना, स्थानीय मुद्दों पर सड़क पर उतरना और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना पार्टी के लिए बेहद जरूरी माना जा रहा है।



