मेरठ संवाददाता एन 20 न्यूज
मेरठ।मोनाड यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित फर्जी डिग्री और प्रमाणपत्र प्रकरण का मामला एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह विश्वविद्यालय से जुड़ी जांच नहीं, बल्कि मामले में आरोपी बनाए गए विश्वविद्यालय के चेयरमैन विजेंद्र सिंह हुड्डा की नई मीडिया पारी है। हुड्डा से जुड़ा NATION 27 मीडिया प्लेटफॉर्म करीब दो-तीन महीने से सक्रिय है। इसकी शुरुआत के कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्रियों समेत कई राजनीतिक हस्तियों की मौजूदगी ने इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया है।मोनाड यूनिवर्सिटी मामले में उत्तर प्रदेश एसटीएफ ने मई 2025 में कार्रवाई करते हुए विजेंद्र हुड्डा समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया था। जांच के दौरान बड़ी संख्या में संदिग्ध डिग्री, मार्कशीट और अन्य शैक्षणिक प्रमाणपत्र बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई थी। बाद में मामले में कई आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल होने की बात भी सामने आई।जांच का दायरा आगे बढ़ा तो प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई भी सामने आई। ईडी ने कथित मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े पहलुओं की जांच के तहत मोनाड यूनिवर्सिटी से संबंधित परिसरों में तलाशी ली और दस्तावेज तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए जाने की जानकारी दी।हालांकि, कानूनी रूप से महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विजेंद्र सिंह हुड्डा को इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है। ऐसे में उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध किया जाना अभी बाकी है।
अब राजनीतिक मंच पर चर्चा क्यों?
मोनाड प्रकरण की जांच के बीच विजेंद्र हुड्डा का मीडिया क्षेत्र में सक्रिय होना और NATION 27 की शुरुआत ने कई सवालों को जन्म दिया है। खास तौर पर तब, जब इसके कार्यक्रम में अलग-अलग राजनीतिक दलों से जुड़े प्रमुख चेहरे दिखाई दिए।सबसे ज्यादा चर्चा समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी को लेकर है। अखिलेश यादव लंबे समय से भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा सरकार को घेरते रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिन लोगों के खिलाफ जांच एजेंसियों में गंभीर मामले चल रहे हों, उनके सार्वजनिक कार्यक्रमों में राजनीतिक नेताओं की भागीदारी को किस नजरिए से देखा जाना चाहिए।
सरकार और विपक्ष दोनों से सवाल
मोनाड मामले में उत्तर प्रदेश की जांच एजेंसियों द्वारा कार्रवाई की गई। दूसरी ओर इसी प्रकरण से जुड़े व्यक्ति की नई मीडिया संस्था के कार्यक्रम में सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं की मौजूदगी सामने आई।इस पूरे घटनाक्रम के बीच जनता के सामने कई सवाल हैं—क्या भ्रष्टाचार और आर्थिक अनियमितताओं के मामलों में कार्रवाई राजनीतिक पहचान से अलग होकर होगी? क्या सत्ता बदलने पर पुराने मामलों की जांच उसी गंभीरता से आगे बढ़ेगी? और क्या राजनीतिक दल जांच के दायरे में रहे लोगों के साथ सार्वजनिक मंच साझा करने के मामले में एक समान मापदंड अपनाएंगे?
इन सवालों का जवाब आने वाले समय में राजनीतिक दलों और संबंधित नेताओं के बयानों से ही स्पष्ट होगा।
अखिलेश के बयान को लेकर भी स्थिति साफ होना जरूरी
भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को लेकर अखिलेश यादव के सार्वजनिक बयानों की चर्चा अक्सर राजनीतिक मंचों पर होती रही है। लेकिन NATION 27 के कार्यक्रम में उन्होंने विशेष रूप से मोनाड यूनिवर्सिटी प्रकरण के आरोपियों के संबंध में कोई ऐसा बयान दिया हो कि “सरकार बनने के बाद इन्हें छोड़ा नहीं जाएगा”, इसकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध सामग्री से नहीं होती। इसलिए इस बात को उनका प्रत्यक्ष बयान बताने के बजाय राजनीतिक सवाल के रूप में ही रखा जाना उचित है।मोनाड यूनिवर्सिटी प्रकरण की जांच और न्यायिक प्रक्रिया अपनी जगह है, जबकि NATION 27 की मीडिया गतिविधियां अलग विषय हैं। दोनों को जोड़कर अंतिम निष्कर्ष निकालने के बजाय जांच एजेंसियों की कार्रवाई, अदालत की प्रक्रिया और राजनीतिक नेताओं के सार्वजनिक बयानों को अलग-अलग देखना जरूरी है।फिलहाल निगाह इस बात पर है कि मोनाड यूनिवर्सिटी प्रकरण में आगे जांच और अदालत की कार्रवाई किस दिशा में जाती है और NATION 27 से जुड़े राजनीतिक संपर्कों को लेकर संबंधित नेता और संस्थान क्या सार्वजनिक स्पष्टीकरण देते हैं।



