मेरठ संवाददाता एन 20 न्यूज़
मेरठ।जहाँ अधिकांश स्कूलों में पीरियड, असेंबली, इंटरवल और छुट्टी के समय पर घंटी बजाना एक सामान्य प्रक्रिया है, वहीं सरधना के लश्करगंज स्थित नेशनल पब्लिक स्कूल पिछले 25 वर्षों से इस परंपरा को तोड़ते हुए एक अनोखी शिक्षा प्रणाली को अपनाए हुए है। यहां न तो कोई घंटी बजती है, और न ही इसके अभाव में किसी प्रकार की अव्यवस्था होती है।विद्यालय के संस्थापक एवं संचालक मुदस्सिर राणा ने इस नीति के पीछे की सोच साझा करते हुए बताया कि“हमने यह निर्णय बच्चों को समय का मूल्य समझाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से लिया। जब बच्चे खुद समय का ध्यान रखना सीखते हैं, तो उनमें जिम्मेदारी की भावना खुद-ब-खुद विकसित हो जाती है।”उन्होंने बताया कि पहले इसे केवल एक प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया था। धीरे-धीरे बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों ने इस पहल को समझा और समर्थन दिया। आज यह स्कूल की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।हर छात्र को घड़ी देखना सिखाया जाता है। कक्षा की शुरुआत और समाप्ति तय समय के अनुसार होती है, और शिक्षक तथा विद्यार्थी दोनों ही समय का सख्ती से पालन करते हैं।प्रातः असेंबली निर्धारित समय पर शुरू होती है और सभी विद्यार्थी समय से पहले मैदान में पहुंच जाते हैं।इंटरवल और छुट्टी के समय भी कोई घंटी नहीं बजती, फिर भी पूरा वातावरण अनुशासित रहता है। शिक्षक भी अपनी कक्षाओं में समय का विशेष ध्यान रखते हैं और बिना किसी बाहरी संकेत के समयानुसार पढ़ाई शुरू और समाप्त करते हैं।विद्यालय प्रशासन के अनुसार, इस पहल से विद्यार्थियों में समयबद्धता, अनुशासन और आत्मनियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण गुण विकसित हुए हैं।बच्चों के अभिभावक भी इस पहल की सराहना करते हैं। स्थानीय निवासी और एक छात्र के पिता मोहम्मद इमरान का कहना है“हमारे बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही समय का पालन करना सीख गए हैं। उन्हें किसी भी काम के लिए टोकने की जरूरत नहीं पड़ती। यह आदत भविष्य में उनके जीवन को सफल बना सकती है।”विद्यालय के वरिष्ठ शिक्षिका रुबीना मिर्ज़ा बताती हैं “शुरुआती वर्षों में थोड़ी चुनौती जरूर थी, लेकिन जब हमने बच्चों में आए बदलाव देखे, तो हमें यकीन हो गया कि यह तरीका वास्तव में असरदार है। अब तो नए शिक्षक भी इस पद्धति को सहज रूप से अपना लेते हैं।”नेशनल पब्लिक स्कूल की यह पहल अब कई अन्य शिक्षण संस्थानों के लिए भी एक प्रेरणास्रोत बन रही है। यह सिद्ध करता है कि यदि विद्यालय बच्चों के सर्वांगीण विकास की दिशा में रचनात्मक और व्यवहारिक प्रयोग करें, तो शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई जा सकती है।

